उस दुनिया में एक साधारण सप्ताह की कल्पना करें जिसे हम चाहते हैं। एक नर्स अपनी पाली कागजी काम के बजाय मरीजों के साथ बिताती है, क्योंकि सॉफ्टवेयर उसके लिए काम करता है और उसके श्रमिक संगठन के प्रति जवाबदेह है। एक अनुवादक, जिसका काम बदल गया है, उसे उन भाषाओं से मशीनों की कमाई का हिस्सा मिलता है जो उसके जैसे लोगों ने उन्हें सिखाई थीं। एक परिवार को शुक्रवार की दोपहर फिर अपने लिए मिलती है, क्योंकि स्वचालन के लाभ को मुनाफ़े के बजाय समय में बदला गया। किसी को ऐसी प्रणाली द्वारा ऋण, लाभ या वीजा देने से इनकार नहीं किया जाता जिससे वह सवाल नहीं कर सकता। इस सबके लिए तकनीक पहले से मौजूद है; जो नहीं है, वह यह तय करने की ताकत है कि उसका इस्तेमाल कैसे हो।
वह ताकत किसी सरहद पर नहीं रुकेगी, क्योंकि हमने जिन चीज़ों का वर्णन किया है, उनमें से कोई भी नहीं रुकती। मुट्ठी भर शहरों में बन रही प्रणालियाँ हर महाद्वीप की जिंदगियों को संचालित करेंगी, पूँजी किसी भी संसद की पकड़ से तेज चलती है, और गर्म होता ग्रह पासपोर्ट नहीं देखता। इस बीच हमारे औजार अब भी राष्ट्र-राज्य की सीमा पर आकर खत्म हो जाते हैं। इस सदी की जड़ में यही असंगति है, और कोई देश इसे अकेले नहीं सुलझा पाएगा।
इसलिए हम ऐसे लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं जो सरहदों के पार पहुँचे। ऐसे नियम जो हर जगह ताकतवरों को बाँधें, राष्ट्रीय स्तर से ऊपर की ऐसी संस्थाएँ जो सरकारों के बजाय जनता के प्रति जवाबदेह हों, और गरिमा का ऐसा न्यूनतम आधार जो आपका जन्म कहीं भी हुआ हो, कायम रहे। भिन्नताओं से रहित दुनिया नहीं, बल्कि ऐसी दुनिया जहाँ जन्मस्थान का संयोग अब यह तय न करे कि किसी जीवन की क्या कीमत है।
हर व्यक्ति जिसे हम संगठित करते हैं और हर कानून जिसे हम बदलते हैं, उस मंजिल की ओर एक कदम है, और हर कदम अगले को आसान बनाता है। हम ऐसा आंदोलन बना रहे हैं जो सरहदों के पार ताकत ले जा सके, राष्ट्रीय लोकतंत्र की जगह लेकर नहीं, बल्कि उसे एक व्यापक उद्देश्य के प्रति जवाबदेह बनाकर।
एक दिन लोग उन संस्थाओं के लिए प्रतिनिधि चुनेंगे जिनके पास उन ताकतों को नियंत्रित करने का अधिकार होगा जिन्हें कोई देश अकेले नियंत्रित नहीं कर सकता। तब तक हम इस मंजिल को हर उस संस्था में ले जाएँगे जहाँ तक हम पहुँच सकते हैं। हम किसी से अपने देश और दुनिया के बीच चुनाव करने को नहीं कह रहे। हम मुट्ठी भर लोगों को दोनों पर राज नहीं करने देंगे।
हम आशा करते हैं कि हम गलत हों। लेकिन सही होकर बहुत देर कर देने से बेहतर है कि हम संगठित हों और गलत साबित हों।